गुरुवार, 5 नवंबर 2009

भारतीय मानसिकता


मै काफी दिनो से यह सोच रहा था कि जिस तरह से महंगाई बढ़ रही है, वस्‍तुओं के दाम आम जनता की पहुंच से बाहर हो रहे है, जनता अपनी बुनियादी जरूरतों को भी पूरा करने में असहाय महसूस कर रही है। उसका खामियाजा सरकार को भुगतना पड़ सकता है। इसके लिए उचित अवसर भी आ रहा था। यह अवसर था तीन राज्‍यों में विधानसभा चुनाव का। वोट पड़ गए। मतगणना का दिन आ गया। मैंने सोचा कि आज सरकार को अपनी नाकामयाबी की कीमत चुकानी पड़ेगी परंतु यह क्‍या। जैसे-जैसे मतगणना आगे बढ़ रही थी वैसे-वैसे मैं अपने चिंतन पर शर्मिंदा था। शाम होते-होते तीनों राज्‍यों में सत्‍ता पक्ष सतारूढ़ होने के पुन:  करीब था। मेरा मन उद्वेलित हो उठा कि आम जनता को यही अवसर था जब वह सरकार को उसके महंगाई रोकने की असफलता का मजा चखा सकती थी परंतु परिणाम ठीक इसके विपरीत आया। चिंतन फिर चैतन्‍य हुआ और मन इन परिणामों के मद्देनजर भारतीय जनमानस के चिंतन के मूल में जा पहुंचा। अंत में मैं यही निष्‍कर्ष निकाल पाने में कामयाब रहा कि भारतवासी सचमुच एक शांतप्रिय जनमानस है जिनसे महंगाई सही जा सकती है, वह अधिक मूल्‍य पर सामान खरीद कर अपना जीवनयापन कर सकता है, अपने  खाने में कटौती करके महंगाई की मार सह सकता है परंतु उसके लिए आतंकवाद और सम्‍प्रदायवाद बर्दास्‍त नहीं है। इन परिणामों के पीछे यही एक चीज मुखरित होकर सबके समक्ष आती है कि अगर देश में अमन चैन है, साम्‍प्रदायिक सदभाव है, दंगे-फसाद  नहीं है, आम इंसान शांति की जिंदगी जी पा रहा है। उसका जीवन सुरक्षित है तो वह महंगाई को सह सकता है। महंगाई उसके लिए छोटी बुराई है। इन चुनावों ने पूरे देश के समक्ष एक बार फिर से भारतीय जनमानस की धर्म निरपेक्षता और शांतप्रियता को सबके समक्ष रखा है। अत: सरकार को अब महंगाई रोकने का भरपूर प्रयास करना चाहिए।


विनोद राय

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